जय शिवशंकर जय गंगाधर – Jai Shivshankar Jai Gangadhar Lyrics In Hind

Jai Shivshankar Jai Gangadhar Lyrics In Hindi, Jai Shivshankar Jai Gangadhar Is A Latest Shiv Bhajan/Devotional Song. Sung By Rakesh Kala. And Bholenath Always Keeps His Blessings On His Devotees.


Jai Shivshankar Jai Gangadhar Lyrics In Hind

जय शिवशंकर, जय गंगाधर,
करुणा-कर करतार हरे ।
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे ।।

जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे ।
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे ।।

निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे ।
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे ।।

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं लिरिक्स

त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे ।
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे ।।

नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो ।
किस मुख से हे गुणातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो ।।

जय भवकारक, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो ।
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाकर की जय हो ।।

शिव शंकर डमरू वाले

पार लगा दो भव सागर से, बनकर करूणाधार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

जय मनभावन, जय अतिपावन, शोकनशावन,शिव शम्भो ।
विपद विदारन, अधम उदारन, सत्य सनातन शिव शम्भो ।।

सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो ।
मदन कदन कर पाप हरन हर, चरन मनन, धन शिव शम्भो ।।

विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

मेरा भोला है भंडारी करे नंदी की सवारी लिरिक्स

भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी ।
सरल हृदय,अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी ।।

निमिष मात्र में देते हैं,नवनिधि मन मानी शिव योगी ।
भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी शिव योगी ।।

स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना ।
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना ।।

सुबह सुबह ले शिव का नाम लिरिक्स

रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना ।
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना ।।

एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो ।
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो ।।

त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो ।
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो ।।

नगर में जोगी आया लिरिक्स

स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।।

तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे ।
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे ।।

विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे ।
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे ।।

पार्वती बोली शंकर से लिरिक्स

मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे ।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ।


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